*उम्र* की डोर से फिर
एक मोती झड़ रहा है....
तारीख़ों के जीने से
_दिसम्बर फिर उतर रहा है.._
कुछ चेहरे घटे,चंद यादें
जुड़ी गए वक़्त में....
उम्र का पंछी नित दूर और
दूर निकल रहा है..
गुनगुनी धूप और ठिठुरी
रातें जाड़ों की...
गुज़रे लम्हों पर झीना-झीना
सा इक पर्दा गिर रहा है..
ज़ायका लिया नहीं और
फिसल गई ज़िन्दगी...
वक़्त है कि सब कुछ समेटे
बादल बन उड़ रहा है..
_फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है.._
_बूढ़ा दिसम्बर, जवां जनवरी के कदमों मे बिछ रहा है..._
_लो अब इस सदी को पचीसवाँ साल लग रहा है...._💖🎻🌹
*साल का अंतिम माह दिसंबर है*
*दि*-- *दिलों का*
*सं*-- *संबध*
*ब*-- *बरकरार*
*र*-- *रहे....*
हम सब का साथ हमेशा बना रहेl
🥰❤️❤️🙏🙏